दहलीज़
वक़्त की दहलीज़ पर
न कोई दोष मेरान कोई दोष तेराकिस्मत महज़ फिसल गईवक़्त की दहलीज़ पर!
स्वप्न कि जैसे दूबों परइंद्रधनुष भोर केअब निराश्रित यों कि जैसेपंख टूटे मोर के
गल गई किरन-किरनमर गया सवेराउमर-सी तुम निकल गईप्रथम-प्रणय तीज पर!
न कोई दोष मेरान कोई दोष तेराकिस्मत महज़ फिसल गईवक़्त की दहलीज़ पर!
शब्द कि ऐसे देते दस्तकसुधियों के द्वार परपत्र लिए जैसे कोईकभी-कभी त्यौहार पर
गिर गई पलक-किरनजी गया अंधेराबरफ़-सी कुछ पिघल गईश्वास के तावीज़ पर!
न कोई दोष मेरान कोई दोष तेराकिस्मत महज़ फिसल गईवक़्त की दहलीज़ पर!
Sunday, October 19, 2008
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